कनकधारा स्त्रोत की रचना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य भोजन की तलाश में भटक रहे थे। वे भिक्षा मांगने किसी गरीब ब्राह्मण के घर पहुँचे ।परंतु वो ब्राह्मण बहुत ही गरीब था, उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने भिक्षा के रूप में गुरु शंकराचार्य को एक सूखा आंवला दे दिया। ब्राह्मण की दरिद्रता दूर करने के लिए उन्होंने मां लक्ष्मी से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पूरी होते ही ब्राह्मण के घर सोने के आंवलों की वर्षा होने लगी। गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई प्रार्थना कनकधारा स्त्रोत के नाम से जानी जाती है।
कनकधारा स्त्रोत के फायदे (Benefits of Kanakdhara Strotram)
कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ करने से लक्ष्मी माँ का आशीर्वाद हमेशा के लिए हम पर बना रहाता हैं। इससे माता लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं। कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से धन की कमी दूर होती है और धन की निरंतर प्राप्ति।
कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलता है। तथा घर में हमेशा के लिए संपन्नता और खुशहाली बनी रहती हैं।
कब करें कनकधारा यंत्र का प्रयोग
धन प्राप्ति की कामना हो ,तो रवि या गुरु पुष्य नक्षत्र या किसी शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी की तस्वीर के सामने कनकधारा यंत्र की स्थापना करें।
कोई भी यंत्र तभी लाभ देता है जब उसे उसके मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित किया जाए। अपने घर या दुकान में कनकधारा स्रोत को स्थापित करने से पूर्व 108 बार इस मंत्र से इसे अभिमंत्रित जरूर कर लें :
ऊं वं श्रीं वं ऐं लीं क्लीं कनकधारयै स्वाहा।।
कनकधारा यंत्र पूजन विधि
सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात् कनकधारा यंत्र की स्थापना की तैयारी करें। पूजन स्थल में आसन बिछा कर बैठ जाएं और अपने घर के पूजन स्थल में लाल रंग के वस्त्र पर गंगाजल और दूध छिड़क कर कनकधारा यंत्र को स्थापित करें। आप चाहे तो कनकधारा यंत्र को अपनी तिजोरी या दुकान आदि में स्थापित कर सकते हैं। पंचामृत, (दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल) से कनकधारा यंत्र को स्नान करवाएं।
लाल चंदन, लाल रंग के फूल पुष्प, रोली और अक्षर से कनकधारा यंत्र की पूजा करें और उस पर लाल रंग की चुनरी/चुन्नी चढाएं। इसके बाद धूप, दीप से श्रीयंत्र की पूजा करें। लक्ष्मी, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती मंत्र का पाठ करें और भोग तृप्त करें। पूर्ण श्रद्धा से पूजन कर कनकधारा यंत्र की स्थापना करें। बाद में आपको नियमित रूप से कनकधारा यंत्र की पूजा करनी चाहिए।
कनकधारा स्त्रोत
अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।
मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।
बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।
दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।
इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।
गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।
श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।
नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।
सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।
यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।
सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।
दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।
|| इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ||